कवचाष्टक
श्री हरिदास कवचाष्टक
ओ३म् नमन करत परमेश्वर देवा, करिये पार हमारा खेवा ।
आसन शुद्धि कीजिए हरिदासा, निर्मल बुद्धि बिशु जगदीशा ।
नीचे रक्षा करों महीशा, ऊपर विशम्बर जगदीशा ।
पूर्व दिशा इन्द्र सुर स्वामी, अग्नि ज्योति गुरू अन्तर्यामी ।
दक्षिण की रक्षा यम राई, नई ऋतु की नर हर सुखदाई ।
पश्चिम बरूण विज संसारा, बायव बाय जीवा वनधरा ।
उत्तर ब्रह्म शक्ति सुरेशा, ईश दिशा शिव कृपा हमेशा ।
श्री ररिदास का ईष्ट लिया जिन, उनकी रक्षा करिये सब दिन ।
जो रिपु धर्म विनाशक होवे, रोक होय सुख सम्पत्ति खोवे ।
वाद–विवाद करे जो कोई, हरेई दमन सुमरित सोई ।
पाँच पाठ जो नित्य करे है, उनके सारे काम सरे है ।
मोर परख से झाड़ लगावेंगे, सफल जीवन सब रो नशावें ।
शुक्ला छट आसौजा, वो ही मन्दिर करि अनुरागा ।
इष्ट मन आष्टो सत वारे, पद मनोरथ पूरे हो सारे ।
।। दोहा ।।
नित पद आसन बैठक, कबच पढ़े धर ध्यान ।
ऋद्धि–सिद्धि फल पायके, अन्त लहे कल्यान ।
