"समाधि" और "मेला"
बाबा हरिदास जी की समाधि
विक्रम संवत् 1691 तथा ईस्वी सन् 1634 में कार्तिक शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के पावन दिन संत शिरोमणि बाबा हरिदास जी ने अपने अनुयायियों को पूर्व सूचना देकर धूप लेने (समाधि) की घोषणा की। यह समाचार पूरे क्षेत्र में आश्चर्यजनक रूप से फैल गया और दूर-दूर से श्रद्धालु, संत, महात्मा तथा ग्रामीण उनके अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़े।
जिस स्थान पर आज उनकी अमर समाधि स्थित है, वहीं पाँच धूणे स्थापित किए गए और उनके मध्य बाबा जी के बैठने का स्थान बनाया गया। जब बाबा हरिदास जी समाधि लेने के लिए धूणों के मध्य पहुँचे, तब उनके मुखमंडल पर अद्भुत तेज, प्रसन्नता और दिव्य आभा दिखाई दे रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे किसी दिव्य लोक की यात्रा के लिए उत्सुक हों।
चारों ओर “संत बाबा हरिदास जी की जय” के उद्घोष गूँज रहे थे। विद्वान पंडित वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, गायत्री मंत्र का अखंड पाठ चल रहा था तथा वातावरण धूप और यज्ञ की सुगंध से सुवासित था।
अंततः पाँचों धूणों की अग्नि एक होकर आकाश की ओर एक विशाल ज्योति के रूप में उठी और उसी दिव्य क्षण में बाबा हरिदास जी समाधि के माध्यम से अंतर्ध्यान होकर अमर हो गए। श्रद्धालुओं के अनुसार यह दृश्य अलौकिक और अद्भुत था, जिसे देखकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो उठा।
अमर समाधि का निर्माण
बाबा हरिदास जी के धूप लेने के पश्चात उनके स्मरण में उसी स्थान पर एक समाधि का निर्माण किया गया। समय के साथ इस समाधि का विस्तार हुआ और आज यह एक भव्य एवं श्रद्धापूर्ण स्मारक के रूप में स्थापित है।
समाधि परिसर में बाबा हरिदास जी की समाधि के साथ उनके तीन प्रमुख साथियों की समाधियाँ भी स्थित हैं—
बकतू साधु जी
बाबा हरिदास जी के दाहिनी ओर स्थित।
बन्ती साधु (कीनदास) जी
बाबा हरिदास जी के बाईं ओर स्थित।
मौजी साधु जी
बाबा हरिदास जी के पीछे स्थित।
मल्लाह तीर्थ का महत्व
बाबा हरिदास जी की स्मृतियों से जुड़ा पवित्र “मल्लाह तालाब” श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है। तालाब के निकट श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु धर्मशाला तथा पुरुष एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नान घाट निर्मित किए गए हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मल्लाह तालाब का जल अत्यंत पवित्र है और इसमें स्नान करने से अनेक शारीरिक एवं मानसिक कष्ट दूर होते हैं। इस तालाब का जल वर्षभर बना रहता है तथा इसकी पवित्रता में लोगों की अटूट श्रद्धा है।
बाबा हरिदास जी का मेला एवं उत्सव
संतों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले
“सन्तों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले,
धर्म पर डटने वालों का यही बाकी निशां होगा।”
बाबा हरिदास जी के समाधि लेने के पश्चात उपस्थित संतों, महात्माओं और श्रद्धालुओं की विशाल सभा में यह निर्णय लिया गया कि उनकी अमर स्मृति को सदैव जीवित रखने के लिए प्रतिवर्ष उनकी समाधि पर विशेष मेले आयोजित किए जाएँ।
दो प्रमुख वार्षिक मेले
सभा की सर्वसम्मति से दो प्रमुख मेलों का आयोजन निर्धारित किया गया—
चैत्र शुक्ला छठ (चैत्र चाँदनी छठ)
यह मेला बाबा हरिदास जी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है।
आसोज शुक्ला छठ (आसोज चाँदनी छठ)
यह मेला बाबा जी की पावन स्मृति में आयोजित किया जाता है।
इन दोनों मेलों की परंपरा उस समय से लेकर आज तक निरंतर और श्रद्धापूर्वक चली आ रही है।
मासिक चाँदनी छठ मेला
केवल वार्षिक मेले ही नहीं, बल्कि प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की चाँदनी छठ के दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा हरिदास जी की अमर समाधि और पवित्र मल्लाह तीर्थ पर पहुँचते हैं।
भक्तजन स्नान करते हैं, घी की ज्योति प्रज्वलित करते हैं तथा प्रसाद अर्पित कर श्रद्धापूर्वक वितरित करते हैं।
खीर प्रसाद की परंपरा
बाबा हरिदास जी के अनुयायी प्रत्येक मास शुक्ल पक्ष की चाँदनी छठ को विशेष पर्व के रूप में मनाते हैं। इस दिन घरों में दूध की खीर बनाई जाती है और परिवार के सभी सदस्य श्रद्धा एवं भक्ति के साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह परंपरा वर्षों से निरंतर चली आ रही है।
सर्वधर्म एवं सर्वसमाज का संगम
बाबा हरिदास जी के अनुयायी किसी एक जाति, समाज या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। देश के विभिन्न भागों से सभी वर्गों और समुदायों के लोग उनकी समाधि पर श्रद्धा अर्पित करने आते हैं। यह मेला सामाजिक समरसता, भाईचारे और आध्यात्मिक एकता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
श्रद्धा और विश्वास की परंपरा
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा हरिदास जी का स्मरण करके आरंभ किया गया प्रत्येक शुभ कार्य सफल होता है। इसी आस्था और विश्वास के कारण उनकी अमर समाधि पर वर्षभर श्रद्धालुओं का आगमन बना रहता है। आज भी बाबा हरिदास जी की पावन स्मृति लाखों भक्तों के हृदय में जीवित है और उनकी शिक्षाएँ मानवता को सही मार्ग दिखा रही हैं।
