हरिदास चालीसा
हरिदास चालीसा
।। दोहा ।।
बन्दि गुरू पद प्रेम, गिरजा सुमन मनाय।
कहु हरिदास विमल यश, शारद शीश नवाय।।
झाड़ौदै मे श्री हरिदास की, झांकी बनी ललाम।
दर्शन से सब दुःख मिटे, सिद्ध होय सब काम।।
।। चौपाई ।।
जै जै श्री हरिदास महाराजा, सुमरत सिद्ध हौय सब काजा।
हरत ताप दुःख अध के भारा, अर्व अनोरथ पूरण द्वारा।
अखिल भुवन के तुम हो स्वामी, घट-घट वासी अन्तर्यामी।
तुम केशव जगदीशा, तुम श्री पति सुरनर केईसा।
पद नाम विष्णु अवतारा, कहा कहो यश नाथ तुम्हारा।
अगम अनुप अलख अविनाशी, माया धारी सब सुख रासी।
सोवित गल विच सुर माला, हँसती सूतर बहुँ विशाला।
सूरज सन्मुख मन्दिर छाजे, पाँचों टेम झालरा बाजे।
भीड़ पड़े दर्शन की भारी, जै जै कार करे नर नारी।
मकराने का मन्दिर छाजे, ऊपर लाल ध्वजा लहरावे।
सामने मूर्ति तुम्हारी भारी, जिसकी शोभा सबसे न्यारी।
राधा कृष्ण परिक्रमा माही, दर्श किये दुःख रहते नाही।
निज मन्दिर की छवि अति छाजे, मृग सिंहासन हरिदास विराजै।
स्वर्ग छटा छत्र है भारी, दर्शन कर सुरनर बलिहारी।
नौबत शंख नकारा बाजें, सुनत पाप मने के भांजे।
सुनि घंटा झालर झनकारा, भूल जात है नर दुःख सारा।
अखंड ज्योति जले दिन राती, जाकी महिमा कही ना जाती।
भीड़ अपार दर्श को आवे, मन वांछित कारज को आवे।
पापी जन चरणों में लौटे, काटे कर्म पलक में खोटे।
कई दण्डवत करते जाव, निज इच्छा लायक वर पावे।
कोढ़ी निशदिन द्वारा पुकारे, अपने तन का रोग निवारे।
अंधे जन को ध्यान लगाही, खुलते नैन पलक के माही।
मन दृढ़ करि जो गुण गावे, सो निपुत्र निश्चय सुत पावे।
धरे ध्यान जो तब दृढ़ मन माही, ताको दुर्लभ फिर कुछ नाही।
चारों मूर्ख शरणा गत आया, मेटो नाथ कलु की छाया।
काठ कामना भक्ति दीजे, चरण शरण प्रभु अपनी लीजे।
जैसे अधम अनेकों तारें, वैसे दुःख हरो नाथ हमारे।
जय जय अनन्त अविनाशी, करत कृपा सबके घटवासीं।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै, भ्रमित रहे मोंहि चैन न आवे।
त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकरो, यहि अवसर मोहि आन उबारो।
ले चमटा सत्रुन को मारो, संकट से मोहि आन उबारो।
माता पिता भ्राता सब कोई, संकट में पूछत नहि कोई।
स्वामी एक है आस तुम्हारी, आप हरयु अब संकट भारी।
धन निर्धन को देत सदा ही, जो कोइ जांचें वो फल पाहीं।
अस्तुति केहि विधी करहु तुम्हारी, क्षमहु नाथ अब चूक हमारी।
जै जै जै तीन लोक के नाथा, सुनियों प्रभु दीन की गाथा।
जो यह पढ़े हरिदास चालिसा, विनसे कष्ट कहैं हरिदास।
करहिं पाठ जो नित चित लाई, रिद्धि सिद्धि घर होवे सहाई।
सात पाठ जो नित्य करहिं, मन इच्छा कारज सभी सरही।
करहिं पाठ जो सत चित लाई, तन मन निर्मल हो जाई।
सहस्त्र बार जो इसको गावै, भक्ति-मुक्ति निश्चय पावे।
भूत पिशाच निकट नहीं आवें, जो यह हरिदास चालिसा गावे।
जब-जब जन्म धरा पा पाऊँ, हरिदास तुम्हारे ही गुण गाऊँ।
जो यह हरिदास चालिसा गावे, सब सुख भोग परम पद पावे।
ओमानन्द चरणों का चेरा, राखो शरण कष्ट निवेरा।
।। दोहा ।।
सकट शाप सन्ताप हर, कामादिक कर नास ।
भक्ति चरण की दीजिए, ओनन्द जी दृढ़ विश्वास ।
