जन्म एवं बाल्यकाल
जन्म एवं बाल्यकाल
संत बाबा हरिदास जी का जन्म विक्रम संवत 1651 की चैत्र शुक्ला षष्ठी (चेत चाँदनी छठ) के दिन प्रातः लगभग चार बजे झाड़ौदा कलाँ ग्राम में हुआ था।
जन्म के समय एक अद्भुत घटना हुई। सामान्य बालकों की भाँति रोने के स्थान पर वे शांत रहे। जब दाई ने उनके ऊपर ठंडे पानी के छींटे डाले तो वे रोने के बजाय मुस्कुराने लगे। इस घटना ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।
उनके पिता श्री दलपत सिंह जी तथा माता श्रीमती मानकौर जी धार्मिक और संस्कारवान व्यक्तित्व के धनी थे। विशेष रूप से माता मानकौर जी अत्यंत धर्मपरायण, दयालु और सदाचारी महिला थीं। उनके श्रेष्ठ संस्कारों का प्रभाव बालक हरिसिंह के व्यक्तित्व पर स्पष्ट दिखाई देता था।
बाल्यकाल से ही बाबा जी का स्वभाव अन्य बच्चों से अलग था। वे कभी किसी से झगड़ा नहीं करते थे, सभी बड़ों का सम्मान करते थे तथा सदैव मधुर वाणी बोलते थे। उनका मन भगवान के भजन और ध्यान में लगा रहता था।
जब उन्हें खेतों में पक्षियों की रखवाली के लिए भेजा जाता था, तब वे पक्षियों को भगाने के बजाय उनके लिए पानी की व्यवस्था करते थे। उनकी करुणा और दया की भावना बचपन से ही सभी को प्रभावित करती थी।
धीरे-धीरे लोग उन्हें हरिसिंह के स्थान पर “हरिदास” कहकर पुकारने लगे और उन्हें एक महान आत्मा के रूप में सम्मान देने लगे।
जन्म एवं बाल्यकाल : जीवन यात्रा
दिल्ली के पावन ग्राम झाड़ौदा कलाँ में जन्मे संत बाबा हरिदास जी ने अपने जीवन से मानवता, सेवा और ईश्वर भक्ति का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी शिक्षाएँ प्रेम, करुणा और लोककल्याण का संदेश देती हैं।

चैत्र शुक्ला षष्ठी (चेत चाँदनी छठ) के दिन प्रातः लगभग 4 बजे दिल्ली राज्य के झाड़ौदा कलाँ ग्राम में बाबा हरिदास जी का जन्म हुआ।

जन्म लेते समय बाबा हरिदास जी सामान्य बच्चों की भाँति रोए नहीं। जब दाई ने उनके शरीर पर ठंडे पानी के छींटे डाले तो वे रोने के स्थान पर मुस्कुराने लगे। इस घटना ने परिवार और गाँव के लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया।

जन्म के पश्चात जब ज्योतिषियों ने उनका जन्म मुहूर्त देखा तो उन्होंने भविष्यवाणी की कि यह बालक साधारण नहीं है, बल्कि भविष्य में एक महान संत और लोककल्याणकारी महापुरुष बनेगा।

बाल्यकाल में ही बाबा हरिदास जी ने अपने चरित्र, सेवा भावना, करुणा और ईश्वर भक्ति के माध्यम से यह संकेत दे दिया था कि वे आगे चलकर समाज को नई दिशा देने वाले महान संत बनेंगे।
जब उनके जन्म का समय और मुहूर्त ज्योतिषियों को बताया गया, तो उन्होंने भविष्यवाणी की कि यह बालक साधारण नहीं है। भविष्य में यह एक महान आत्मा और समाज का मार्गदर्शक बनेगा। समय के साथ यह भविष्यवाणी पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई और बालक हरिसिंह आगे चलकर संत बाबा हरिदास जी के नाम से विख्यात हुए।
बाबा हरिदास जी के पिता का नाम श्री दलपत सिंह जी तथा दादा का नाम श्री रणजीत सिंह जी था। उनका परिवार डागर गोत्र के प्रतिष्ठित जाट वंश से संबंधित था। उनके परिवार की पहचान धार्मिकता, सामाजिक सम्मान और उच्च नैतिक मूल्यों के लिए थी।
उनकी माता श्रीमती मानकौर जी अत्यंत धार्मिक, शीलवती और करुणामयी महिला थीं। वे भगवान की अनन्य भक्त थीं तथा दया और धर्म की भावना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। प्रतिदिन घर में घी का दीपक जलाना, भगवान की पूजा करना और पहली रोटी गौ माता को अर्पित करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। वे अपने परिवार को धार्मिक संस्कारों और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देती थीं।
ऐसे धार्मिक वातावरण और संस्कारों का गहरा प्रभाव बालक हरिसिंह के व्यक्तित्व पर पड़ा। बचपन से ही उनमें दया, विनम्रता, सत्यनिष्ठा और आध्यात्मिकता के गुण स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। उनका स्वभाव अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग था। वे कभी किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते थे और न ही किसी के प्रति कटु शब्दों का प्रयोग करते थे। उनकी वाणी सदैव मधुर, प्रेमपूर्ण और सम्मानजनक होती थी।
बालक हरिसिंह सभी बड़ों का आदरपूर्वक अभिवादन करते थे और उनकी आज्ञा का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे। माता-पिता जो भी कार्य उन्हें सौंपते, वे बिना किसी हिचकिचाहट के उसे पूरा करते थे। उनका व्यवहार इतना विनम्र और आकर्षक था कि गाँव के लोग उनसे अत्यंत प्रभावित रहते थे।
बचपन से ही उनका मन सांसारिक खेल-कूद की अपेक्षा भगवान के भजन, ध्यान और सत्संग में अधिक लगता था। जब भी उन्हें किसी कार्य से बाहर भेजा जाता, वे अवसर मिलने पर एकांत में बैठकर ईश्वर का स्मरण करने लगते थे। उनकी यह आध्यात्मिक प्रवृत्ति लोगों को आश्चर्यचकित करती थी।
एक प्रसंग के अनुसार, जब उन्हें खेतों में फसलों की रखवाली के लिए भेजा जाता था, तब वे पक्षियों को भगाने के स्थान पर उनके प्रति दया का भाव रखते थे। वे उनके लिए पानी की व्यवस्था करने का प्रयास करते और उन्हें भी भगवान की सृष्टि का महत्वपूर्ण अंग मानते थे। यह उनकी करुणा और जीव मात्र के प्रति प्रेम का अद्भुत उदाहरण था।
उनकी मधुर वाणी, शांत स्वभाव, सेवा भावना और ईश्वर भक्ति को देखकर गाँव के लोग उन्हें साधारण बालक नहीं मानते थे। धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें सम्मानपूर्वक “महात्मा” कहकर पुकारना शुरू कर दिया। समय के साथ उनका नाम हरिसिंह से अधिक “हरिदास” के रूप में प्रसिद्ध होने लगा।
बाल्यकाल में ही बाबा हरिदास जी ने अपने उत्कृष्ट चरित्र, आदर्श व्यवहार और आध्यात्मिक प्रवृत्ति से समाज के लोगों के हृदय में विशेष स्थान बना लिया था। यही दिव्य गुण आगे चलकर उन्हें एक महान संत, समाज सुधारक और लोककल्याणकारी महापुरुष के रूप में स्थापित करने वाले बने।
बाबा हरिदास जी का बाल्यकाल यह संदेश देता है कि महानता का आधार केवल ज्ञान या शक्ति नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार, विनम्रता, सेवा भावना, करुणा और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा होती है। उनके जीवन का प्रारंभिक चरण आज भी श्रद्धालुओं और समाज के लिए प्रेरणा का अमूल्य स्रोत है।
